Ek Dham Yatra

 
Ek Dham Yatra means visiting anyone among the Char Dhams i.e. Badrinath, Kedarnath, Gangotri or Yamunotri. Badrinath is the most visited Dham in the Ek Dham Yatra. Every year Badrinath receives the largest number of tourists.
Badrinath Yatra 2019:  Badrinath is the most important place in Char Dham Yatra in India. Badrinath is the sacred place of Vishnu Bhagwan. Lord Vishnu is worshipped in the dual form of Nar Narayan.  According to Skanda Puran, there are several sacred shrines in heaven, on earth and in hell but there is no shrine like Badrinath. It is believed that Badrinath yatra opens the door to attain moksha. Badrinath is one among the 108 Divya Deshams of Vaishnavities. One can take a dip at Tapt Kund in front of Badrinath temple. You can also visit Mata Murty temple, Bheem Pul, Vyas Gufa, Ganesh Gufa and Panch Prayag during Ek Dham Yatra. Badrinath yatra is considered as the most pious and important yatra for Hindus.  Badrinath yatra opens for 06 to 07 months every year from April to Nov. The opening dates of Badrinath are announced on Vasant Panchami every year. Badrinath is accessible by road and vehicles go up to the main town. The duration of Badrinath yatra is 02 Nights/ 03 days from Haridwar.
We also arrange Badrinath yatra by helicopter from Dehradun. It is a day trip and the tour will end on the same day by afternoon.
Kedarnath yatra 2019:  Kedarnath yatra is another important yatra in Ek Dham yatra. Kedarnath temple belongs to Lord Shiva and Kedarnath is one of the twelve Jyotirlinga of Lord Shiva. You get transformed to another world when the pandits begin the chanting of mantras. It feels like an unearthly experience, as though Lord Shiva Himself is present inside the Sanctum of the Temple. It is an experience that one must revel in at least once in their lifetime. 
The motorable road goes up to Sonprayag which is 215km from Haridwar. After Sonprayag you have to hire a sharing jeep up to Gaurikund. Gaurikund to Kedarnath is 16 km by trek. The trek has all the facilities for tourists like tea snacks shops, toilets, resting shelters, medical facilities and SDRF personnel to help tourists.
You can also visit Kedarnath by helicopter from Guptkashi and Phata area. We also arrange Kedarnath yatra by helicopter from Dehradun.
The duration of Kedarnath yatra is 02 Nights/03 days if you cover Kedarnath by helicopter from Guptkashi or Phata or by pony from Sonprayag. If one goes by trek and stays at Kedarnath for one night, then the duration of the trip will be 03 Nights/04 days.
Gangotri Yatra 2019: Gangotri is a 275km drive from Haridwar. Gangotri is also an important Dham in the Char Dham Yatra. Gangotri is the starting point of the river Ganga. There is a temple of Goddess Ganga which is worshipped by pilgrims. According to Hindu Mythology, Gangotri is the place from where Ganga came down to earth. The origin of Ganga is located at Gaumukh which is around 20 km from Gangotri. Gangotri is accessible by road and the vehicles go up to Gangotri.  The temple of Gangotri opens every year on Akshaya Tritiya.
Yamunotri Yatra 2019:  Yamunotri is located 265 km from Haridwar. The road goes up to Jankichatti. Then there is a 6 km trek to Yamunotri. Yamunotri is another important Dham in the Char Dham yatra. People first visit Yamunotri when they begin Char Dham Yatra.
Yamunotri is the starting point of the Holy river Yamuna. Yamunotri temple is devoted to Goddess Yamuna. Surya Kund is a hot water spring located close to the temple and pilgrims dip rice and potatoes tied in a muslin cloth. This is offered as Prasad in the temple. Divya Shila is located close to Surya Kund and worshipped before pooja is offered to the main deity. Yamunotri temple opens every year on Akshay Tritiya. chardham yatra indian holidays travel packages

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Char DhamYatra

 

Char Dham Yatra is a tour of the four Hindu shrines namely Yamunotri, Gangotri, Kedarnath and Badrinath. These shrines are located in the Garhwal region of Uttarakhand. This yatra is also called Chota Char Dham Yatra. The holy river Yamuna originates from Yamunotri, Maa Ganga from Gangotri, Mandakani from Kedarnath and Alakhnanda, Saraswati from Badrinath ji. Kedarnath is one of the 12 Jyotirlingas of Shiva in India which is considered to be the main places of worship of Lord Shiva.

The Char Dhams of India are Badrinath, Rameshwaram, Jagannath Puri and Dwarka which were founded by Adi Shankracharya. All Hindus aspire to go to these four shrines once in their lifetime.

It is believed that people can wash away their sins if they complete Char Dham Yatra and also attain Moksha.

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Do Dham Yatra

 

Do Dham yatra means visiting any two dhams from Badrinath, Kedarnath, Gangotri and Yamunotri. But Do dham yatra is mainly considered as the yatra to Kedarnath and Badrinath temples. Badrinath is the place sacred to Vishnu Bhagwan in the dual form of Nar Narayan while Kedarnath is one of the twelve Jyotirlinga’s of Lord Shiva.

This yatra has a lot of significance for Hindus. Every year lakhs of people come to visit Kedarnath-Badrinath in Uttarakhand. Some people who want to avoid trekking go for Badrinath and Gangotri yatra and those who have already visited Badrinath and Kedarnath, visit Yamunotri and Gangotri to complete the Char Dham darshan.

ॐ ब्रज 84 कोस यात्रा ॐ

 

ब्रज भूमि भगवान श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। यह चौरासी कोस की परिधि में फैली हुई है। यहां पर राधा-कृष्ण ने अनेकानेक चमत्कारिकलीलाएं की हैं। सभी लीलाएं यहां के पर्वतों, कुण्डों, वनों और यमुना तट आदि पर की गई। पुराणों में ब्रज भूमि की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि राधा-कृष्ण ब्रज में आज भी नित्य विराजते हैं। अतएव, उनके दर्शन के निमित्त भारत के समस्त तीर्थ यहां विराजमान हैं। यही कारण है कि इस भूमि के दर्शन करने वाले को कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त होता है। ब्रज रज की आराधना करने से भगवान श्री नन्द नन्दन व श्री वृषभानुनंदिनी के श्री चरणों में अनुराग की उत्पत्ति व प्रेम की वृद्धि होती है। साथ ही ब्रज मण्डल में स्थित श्रीकृष्ण लीला क्षेत्रों के दर्शन मात्र से मन को अभूतपूर्व सुख-शांति व आनन्द की प्राप्ति होती है। इसीलिए असंख्य रसिक भक्त जनों ने इस परम पावन व दिव्य लीला-भूमि में निवास कर प्रिया-प्रियतम का अलौकिक साक्षात्कार करके अपना जीवन धन्य किया है। वस्तुत:इस भूमि का कण-कण राधा-कृष्ण की पावन लीलाओं का साक्षी है। यही कारण है कि समूचे ब्रज मण्डल का दर्शन व उसकी पूजा करने के उद्देश्य से देश-विदेश से असंख्य तीर्थ यात्री यहां वर्ष भर आते रहते हैं। ब्रज चौरासी कोस में उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के अलावा हरियाणा के फरीदाबाद जिले की होडलतहसील और राजस्थान के भरतपुरजिले की डीगव कामवनतहसील का पूरा क्षेत्रफल आता है। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा के अंदर 1300से अधिक गांव, 1000सरोवर, 48वन, 24कदम्ब खण्डियां, अनेक पर्वत व यमुना घाट एवं कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा वर्ष भर चलती रहती हैं, किंतु दीपावली से होली तक मौसम की अनुकूलता के कारण प्रमुख रूप से चलती है। इन पद यात्राओं में देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों तीर्थ यात्री जाति, भाषा और प्रान्त की सीमाओं को लांघ कर प्रेम, सौहा‌र्द्र, श्रद्धा, विश्वास, प्रभु भक्ति और भावनात्मक एकता आदि अनेक सद्गुणों के जीवन्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। साथ ही ब्रज संस्कृति से वास्तविक साक्षात्कार भी होता है। इन यात्राओं में राधा-कृष्ण लीला स्थली, नैसर्गिक छटा से ओत-प्रोत वन-उपवन, कुंज-निकुंज, कुण्ड-सरोवर, मंदिर-देवालय आदि के दर्शन होते हैं। इसके अलावा सन्त-महात्माओं और विद्वान आचार्यो आदि के प्रवचन श्रवण करने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। पुराणों में ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा को लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भी कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा चौरासी लाख योनियों के संकट हर लेती है।

शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। गर्ग संहिता में कहा गया है कि एक बार नन्द बाबा व यशोदा मैया ने भगवान श्रीकृष्ण से चारों धामों की यात्रा करने हेतु अपनी इच्छा व्यक्त की थी। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि आप वृद्धावस्था में कहां जाएंगे! मैं चारों धामों को ब्रज में ही बुलाए देता हूं। भगवान श्रीकृष्ण के इतना कहते ही चारों धाम ब्रज में यत्र-तत्र आकर विराजमान हो गए। तत्पश्चात यशोदा मैया व नन्दबाबाने उनकी परिक्रमा की। वस्तुत:तभी से ब्रज में चौरासी कोस की परिक्रमा की शुरुआत मानी जाती है। यह परिक्रमा पुष्टि मार्गीयवैष्णवों के द्वारा मथुरा के विश्राम घाट से एवं अन्य सम्प्रदायों के द्वारा वृंदावन में यमुना पूजन से शुरू होती है। ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा लगभग 268कि.मी. अर्थात् 168मील की होती है। इसकी समयावधि 20से 45दिन की है। परिक्रमा के दौरान तीर्थयात्री भजन गाते, संकीर्तन करते और ब्रज के प्रमुख मंदिरों व दर्शनीय स्थलों के दर्शन करते हुए समूचे ब्रज की बडी ही श्रद्धा के साथ परिक्रमा करते हैं।

कुछ परिक्रमा शुल्क लेकर, कुछ नि:शुल्क निकाली जाती हैं। एक दिन में लगभग 10-12कि.मी. की परिक्रमा होती है। परिक्रमार्थियोंके भोजन व जलपान आदि की व्यवस्था परिक्रमा के साथ चलने वाले रसोडोंमें रहती है। परिक्रमा के कुल जमा 25पडाव होते हैं। आजकल समयाभाव व सुविधा के चलते वाहनों के द्वारा भी ब्रज चौरासी कोस दर्शन यात्राएं होने लगी हैं। इन यात्राओं को लक्जरी कोच बसों या कारों से तीर्थयात्रियों को एक हफ्ते में समूचे ब्रज चौरासी कोस के प्रमुख स्थलों के दर्शन कराए जाते हैं। यात्राएं प्रतिदिन प्रात:काल जिस स्थान से प्रारम्भ होती हैं, रात्रि को वहीं पर आकर समाप्त हो जाती हैं 




 बृज धाम चौरासी कोस यात्रा

विशेष भैया दूज के दिन श्री यमराज को तिलक

  • "आदरणीय प्रिय बंधुओं ..- नमस्कार।सभी माताओं, बहनों व भाईयों एवं बुजुर्गों को सूचित किया जाता है कि बृज चौरासी कोस यात्रा वभैया दूज के दिन श्री यमराज को तिलक लगाकर अर्थात् श्री यमराज को अपना धर्म भाई बना कर के बृजयात्रा का संकल्प पूरा किया जाता है। धर्मराज अपने धर्म भाई को मरणोपरान्त पूर्ण रक्षा करते हुए दोबारा नयाजन्म देने में सार्थक सिद्ध होते हैं।हमारी यह यात्रा दिनांक 21 अक्तूबर 2016, शुक्रवार को जड़ोल से शुरू होगी जिसकी अवधि मात्र 14 दिनकी होगी। 
  • यात्रा वृन्दावन कोसी घाट पर यमुना स्नान और बृज यात्रा संकल्प लेकर शुरू की जाती है 
  • व सभीमन्दिरों के दर्शन करने के पश्चात् यमुना स्नान और श्री यमराज को तिलक लगा कर बृज यात्रा का संकल्प पूराकिया जाता है व इस यात्रा से चौरासी लाख योनियों से छुटकारा मिलता है।
  • बस जड़ोल से चलकर वृन्दावन कोशी घाट, सिद्धपीठ राधा रानी मन्दिर, गोपेश्वर महादेव, भांडीरवन,बंसीवट, बन्दी देवी, अनन्दी देवी 
  • (भगवान कृष्ण की कल देवी) दाऊ जी का मन्दिर (जन्म स्थान) गोकुल (जमनास्नान) योगमाया (जन्म स्थान) रमण रेती,
  •  ब्रह्मांड घाट (कृष्ण ने मिट्टी खाई थी भगवान ने तीनों लोकों के दर्शनदिए) चन्द्रावली मन्दिर, 
  • (राधा रानी की सखी) राधा रानी का मन्दिर (राधा जी का जन्म स्थान) लोहावन, शनिमन्दिर, भूतेश्वर महादेव, नागेश्वर महादेव, मधुवन, ध्रुव नारायण मन्दिर, गोवर्धन, मानसी गंगा, 
  • गोबिन्द कुण्ड,जतीपुरा, श्याम कुण्ड, राधा कुण्ड, डींग पुछरी का लोटा चक्लेश्वर महादेव, 
  • लक्ष्मण मन्दिर आदि। बद्रीनाथ,यमुनोत्री, गंगोत्री, विमल कण्ड, 
  • गौरी कुण्ड, श्री केदारनाथ मन्दिर, भोजन थाली, चरण पहाड़ी,
  •  चन्द्रमा जी का मन्दिरशिव मन्दिर कामेश्वर महादेव, 
  • मदन मोहन बिन्द्रा देवी चौरासी खम्भा, कामवन, विमल कप्ड, कदम खण्डी, देहकुण्ड, ललिता सखी, प्रेम सरोवर, संकेत बन, 
  • नंद गांव, कोकिला वन, राधा कृष्ण मन्दिर, शनि मन्दिर, बरसाना(राधा मंदिर) राधा माधव मन्दिर, शैव्या शेरगढ़ खेलनवन, चीरघाट, गरूड़ गोबिन्द, मथुरा, अक्रर मन्दिर,
  •  भंतरोड़बिहारी, पागल बाबा, प्रेम मंदिर वृन्दावन विड़ला मन्दिर,
  •  हरिद्वार मार्कण्डेय के बाद जड़ोल में वापस आयेगी।

  1. यात्रा का किराया 12 500 रु प्रति यात्री सहयोग होगा।
  2. जिसमें दोनों समय भोजन, चाय First Aid धर्मशाला आदि शामिल है।
  3.  यह यात्रा जडोल से बसोंद्वारा वृंदावन तक जायेगी, बृज चौरासी कोस टाटा सुमों, ट्रैवलर में की जाती है।
  4.  इनका किरायाभी इसी किराये में शामिल है। यात्रा में सामान हल्का ले ।
  5.  किसी भी प्रकार की दुर्घटना के लिए।प्रबन्धक जिम्मेबार नहीं होगा। 
  6. प्रत्येक यात्री एक थाली, गिलास, कटोरी, टार्च व हल्का विस्तर अपनेसाथ लाएं। 
  7. यात्रा में किसी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार केवल संचालक मण्डल को ही होगा।अपनी सीट 2500 

 देकर बुक करवा लें।यदि कोई व्यक्ति यात्रा शुरू होने के पश्चात् किसी कारणवश वापिस आना चाहता है तो उसे पैसेवापिस नहीं होंगे। प्रबन्धक यात्रियों को अधिक से अधिक सुविधा देने की कोशिश करेंगे। फिर भीप्रदेशकाल में असुविधा का होना स्वाभाविक हैं उस समय तपस्या की भावना से सहयोग दें।

सीट बुक करवाने का पता : फोन : 9418076071| काकू शर्मा

98170-34333|

गांव टिकरी, डा. जड़ोल (नजदीक पेट्रोल पंप के सामने) तह. सुन्दरनगर, जिला मण्डी (हि. अ.) 


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पिहोवा यात्रा पितृ पिशाची

 

पिहोवा तीरथ (पृथूदक महातम्य )

महाकाव्‍य महाभारत में पिहोवा का उल्‍लेख, प्रिथुदाका के नाम से किया गया है क्‍योंकि इसी जगह पर दयालु प्रिथु ने अपने पिता की आत्‍मा की शांति के लिए प्रार्थना की थी। यहीं कारण है कि पिहोवा, पूर्वजों की आत्‍मा की शांति और मुक्ति के लिए महत्‍वपूर्ण स्‍थल माना जाता है। पिहोवा, थानेसर से 27 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह स्‍थल, 882 ई. के इतिहास को अपने अस्तित्‍व में समेटे हुए है लेकिन ऐतिहासिक तथ्‍यों से पता चलता है कि यह 895 ई. में अस्तित्‍व में आया।
यह वही स्‍थान है जहां माना जाता है कि उपवास करने से मुक्ति और मोक्ष मिल जाता है और इसी वजह से इसे पितृदाक तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यहां कई घाट और मंदिर है जो राजा के बलिदान को चिन्हित करते हुए दर्शाए गए है।

किंवदंतियों के अनुसार, यह वही स्‍थान है जहां भगवान शिव के बडे पुत्र कार्तिकेय, शिव व पार्वती की परिक्रमा लगाने के बाद विश्राम करने के लिए बैठे थे और उन्‍होने अपनी त्‍वचा को साफ किया था और उस उबटन को मां पार्वती के पास छोड दिया था।

पिहोवा तीरथ का ऐतिहासिक महत्व

पुरातत्वीय प्रमाणों क आधार पर भी इसकी प्रमाणता सिद्ध होती है| कनिंघम के अनुसार विश्वामित्र टीले पर भगवन विष्णु का मंदिर था जो की पुरातत्व की खुदाई में भी मिला था कनिंघम के अनुसार यहाँ पर कई श्राव है जो लुप्त पड़े है |
पुराणों के अनुसार पांडवो के अग्रज़ युधिषिठर ने युद्ध में मारे गए अपने सगे सम्बन्धियों की यहीं पर सद्गति, पिंडदान तथा तीरथकृत्य करवाया था|


   

 पिहोवा तीरथ का महत्व

मारकण्डेय पुराण, महाभारत, भगवत पुराण, वामन पुराण, इत्यादि धार्मिक ग्रंथो में वर्णित वह पवित्र भूमि है जो कि सभी प्रकार दोषो से रहित है | पिहोवा (कुरुक्षेत्र ) को छोड़ कर संसार की सभी जमीन मधुकैटभ की चर्बी (मेद) से बनी है इसीलिए इस भूमि को मेदिनी कहा जाता है |
पिहोवा को धर्मक्षेत्र कहा गया है यहाँ कि भूमि मेदनी नहीं है |


  

पिहोवा यात्रा पितृ पिशाच |आपको ह जानकर अति प्रसन्नता होगी कि हर वर्ष की भान्ति इसवर्ष । पितृ |शादी पिहोवा यात्रा का आयोजन किया गया है यह यात्रा 17मार्च 2015 मंगलवार को 11 बजे आरम्भ होगी 18 रात को दीप जलाया जाता४ 10 ह पिण्ड दान व नान होगा। यात्रा 5 दिन में समाप्त होगा यात्राका पूरा खर्च 3700 रू0 प्रति यात्री होगा। सभी यात्री प्रेमियों से निवेदन है किवह 1000देकर अपनी सीट बुक करवा लें।यात्रा में बस का किराया दो समय भोजन के समय चाय, वफरड-एड व ठहरने की व्यवस्था भी इसी किराये में शामिल है । यात्री कोअपने साथ एक थाली, चम्मच, गिलास व हल्का विस्तर साथ ले जाना होगा।

                 "****दर्शनीय स्थान""**** 

  • कुरुक्षेत्र, भीष्म शैया, अक्षयवर, ब्रह्मा 
  • सरोवर, ज्योतिसर, पिहोवा, 
  • नरकातारी,बाण गंगा, सुर्य कांड, कपाल मोचन,
  •  पांवटा साहिब, ऋषिकेश, लक्ष्मण झुला,राम झूला, 
  • तपोवन, हरिद्वार, 
  • पावन धाम, भीम गोडा, गंगा स्थान, मारकण्डा ।-: 
  • सीट बुक करवाने का पता : *  नाम
  • *गांव टिकरी, डा. जडोल, तह. सुन्दरनगर, जिला मण्डी (हि.प्र.)मो. :
  •  98170-34333, 94180-76071


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तीन धाम यात्रा

ॐ ॐ तीन धाम यात्रा ॐ ॐ

 

तीर्थ यात्रा का महत्व


तीर्थ यात्रा का हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। इसलिए हिन्दू धर्म से संबंधित हर जन जाति के मनुष्य की दिली इच्छा रहती है कि वह अपने जीवन में भारत के सभी तीर्थो के दर्शन करके अपने जीवन को सफल करे। जिसके लिए मनुष्य अपना घर बार बच्चे छोडकर यात्रा पर निकल जाता है, कभी कभी तो वह अपने जीवन भर की सारी सम्पत्ति को भी एक बार में न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जाता है। सवाल यह उठता है कि तीर्थो में ऐसा क्या है। जिसके लिए मनुष्य यह त्याग और बलिदान देने के लिए तैयार हो जाता है। और इस त्याग और बलिदान की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है।

आईए मित्रो सबसे पहले हम तीर्थ शब्द के अर्थ के बारे में जानते आखिर इस तीर्थ नामक पवित्र शब्द में क्या छुपा है? जिसके लिए मनुष्य इतना लयलित रहता है।

तीर्थ का अर्थ

“तीर्थ” शब्द का आधुनिक तरीके से अर्थ निकाला जाए तो “ती” शब्द से तीन और “र्थ” शब्द से अर्थ निकलता है। इस तरह से इसका अर्थ बनता है “तीन अर्थो की सिद्धि” यानि जिससे तीन पदार्थो की प्राप्ति हो उसे तीर्थ कहते है।

आईए इसे मानव के जीवन से जोडकर देखते है। संसार में मानव के जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य माने जाते है। जिसको पूर्ण करने हेतु मनुष्य का पृथ्वी पर जन्म हुआ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

तीर्थ यात्रा का महत्व

इन चारो में अर्थ (धन) तो तीर्थ यात्रा करने में खर्च होता है। अत: इसकी प्राप्ति तीर्थो में नही होती है। सीधी भाषा में कहा जाए तो चाहे आप कितने भी तीर्थो के दर्शन करते रहो वहा आपको धन की प्राप्ति नही हो सकती। धन, राज-भोग, विलास इन सब की कर्मो से प्राप्ति होती है।

धर्म, काम और मोक्षं इन तीनो की प्राप्ति तीर्थ यात्रा से हो जाती है। लोगो की तीरथ यात्रा करने के पिछे अगल अलग मंशा होती है। जो मनुष्य सात्विक है। वो केवल मोक्षं के लिए तीर्थ यात्रा करते है। जो व्यक्ति सात्विक और राजसी वृत्ति के है। वे धर्म के लिए तीर्थ यात्रा करते है। और जो व्यक्ति केवल राजसी वृत्ति के है। वे संसारिक और परलौकिक कामनाओ की सिद्धि के लिए तीर्थ यात्रा करते है।

परंतु जो व्यक्ति निष्काम भाव से यात्रा करते है। केवल उन्हें ही मोक्षं प्राप्त होता है। जो व्यक्ति सकाम भाव से तीरथ यात्रा करते है। उन्हे इस लोक में स्त्री- पुत्र आदि और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। परंतु उन्हे मोक्षं प्राप्त नही हो सकता।

इस संसार में जितने भी तीर्थ है। वो सभी भगवान और भक्तो के साथ से ही बने है। कहने का मतलब यह है कि भक्त बिना भगवान नही, भगवान बिना भक्त नही, और इन दोनो के बिना तीर्थ नही। तीरथ यात्रा का असली मकसद तो आत्मा का उद्धार करना है। इस लोक और परलोक के भोगो की प्राप्ति के लिए और भी बहुत से साधन है। इसलिए हर व्यक्ति को चाहिए कि वह भोगो की प्राप्ति के लिए तीरथ यात्रा न करे। बल्कि आत्मा के कल्याण के लिए तीर्थ यात्रा करे। और जो लोग आत्मा के कल्याण के लिए श्रद्धा व भक्तिपूर्वक नियम का पालन करते हुए तीरथ यात्रा करते है। उसे मोक्षं की प्राप्ति के साथ अन्य लाभ भी होता है।





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ॐ अमरनाथ यात्रा ॐ

           ॐ  अमरनाथ यात्रा  ॐ   जय बावाबर्फानी    


                    ॐ          भूखे को रोटी प्यासे को पानी  ॐ

 ॐ आपको यह जानकर खुसी होगी की हर ब्रश की तरह इस ब्रश भी काकू शर्मा  सूर्य टूर न डट्रवेल्स क द्वारा श्री अमरनाथ जी यात्रा का आयोजन किय आज्ञा है यात्रा स्पेसेल डीलक्स बसों द्वारा कराई जाएगी 

हमारी यात्रा जुलाई प्रथम सप्तहा २०१९ से सुरु होगी 

  1. 1)सीट बुक (पहले आओ पहले पाओ )के सिद्धांत पर होगी ,
  2. २. १००० रूपेस एडवांस देकर अपनी सीट बुक करवा ले 
  3. ३. बस के चौकीदार की ब्यबस्था होने से कही भी आर्म से घुमा जा सकता है 
  4. ४. यात्री को insurance  सुभिधा भी उपलब्ध करवाई जायेगी  
  5. ५, यात्रा में भोजन की ब्यबस्था नहीं होगी (लंगरों की ब्यबस्था रहे गई )
  6. ६. यात्रा की सहयोग राशि 5000  ruppes  मात्र होगी  


                    कार्यक्रम 

  1. १....<जरोल सुंदरनगर ,
  2.     जवाला जी,
  3.    अमरनाथ,कटड़ा
  4.      वैष्णोदेवी ,जम्मू ,
  5.      मानसर झील
  6.      रघुनाथ मंदिर 
  7. ,    हरी पैलेस 
  8.      दूधाधारी मंदिर,
  9.     आपसंभु मंदिर,
  10.      हरकी पौडी 
  11. ,   पत्नी टॉप ,
  12.     नथा टॉप ,बाहु किल्ला ,
  13.     भीमगढ़ किल्ला ,बावा जीतो ,
  14.     अमरमेहल पैलेस बापिस हिमाचल प्रदेश .


  1. १ जून से पहले अपनी सीट बुक करवा ले 
  2. २,ये यात्रा परिवर्तीय क्षेत्र की है अतः यात्रा के दौरान परिस्थितिओ की वजह से कार्यक्रम के समय मार्ग परिवर्तन आ  सकता है 
  3. प्रदेश कॉल में असुभिदा को होना संभाभिक जनक है 
  4. यात्रा के दौरान यात्रिओ की देखभाल व् घूमने के वास्ते कंपनी के कार्यकर्ता साथ रहेंगे फिर भी आर्थिक व् शारीरिक क्षति के लिए यात्री स्बयं ज़ीमेबार रहेगा 
  5. ४) यदि कोई यात्री किसी कारण अस्बस्त होने के कारण अपनी यात्रा अधूरी छोड़ क आता है तो उसे केबल घर तक पहुंचने का रेलवे किर्या हे दिया जायेगा 
  6. ५) समस्त बिबादो का न्याय क्षेत्र सुंदरनगर होगा 
  7. ६) यात्री अपने साथ सूखे मेवे गर्म कपड़े छाता, जूते, व् टार्च अबश्य रखे 

  8. यात्री अपने साथ अपनी पहचान पत्र व् तीन पासपोर्ट फोटो बुकिंग के समय  साथ लाए | 
  9. ८) यदि कोई यात्री हेलीकॉप्टर में जाना चाहे  तो यह खर्चा उसे स्वयं करना होगा 




 ॐ हमारी प्राथना :- हम संसार के कण कण में विद्यमान ईष्वर  से प्राथना करते है की बे  सभी के दिलू में व् घरो  में सुख शांति  बनये रखे  | ॐ 


आयोजक :-  काकू शर्मा    जरोल सुंदरनगर मंडी (हि॰प्र॰) 

         फ़ोन +919418076071  ॐ  




       HISTORY OF AMARNATH 



 अमरनाथ गुफा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थस्‍थल है। इसके बारे में बहुत भ्रम फैलाया जाता है। आजकल बाबा अमरनाथ को 'बर्फानी बाबा' कहकर प्रचारित करने का चलन भी चल रहा है। इसी तरह धर्म का बिगाड़ होता है। असल में यह अमरेश्वर महादेव का स्थान है। प्राचीनकाल में इसे 'अमरेश्वर' कहा जाता था। यह बहुत ही गलत धारणा फैलाई गई है कि इस गुफा को पहली बार किसी मुस्लिम ने 18वीं-19वीं शताब्दी में खोज निकाला था। वह गुज्जर समाज का एक गडरिया था, जिसे बूटा मलिक कहा जाता है। क्या गडरिया इतनी ऊंचाई पर, जहां ऑक्सीजन नहीं के बराबर रहती है, वहां अपनी बकरियों को चराने ले गया था?  

स्थानीय इतिहासकार मानते हैं कि 1869 के ग्रीष्मकाल में गुफा की फिर से खोज की गई और पवित्र गुफा की पहली औपचारिक तीर्थयात्रा 3 साल बाद 1872 में आयोजित की गई थी। इस तीर्थयात्रा में मलिक भी साथ थे।

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एक अंग्रेज लेखक लारेंस अपनी पुस्तक 'वैली ऑफ कश्मीर' में लिखते हैं कि पहले मट्टन के कश्मीरी ब्राह्मण अमरनाथ के तीर्थयात्रियों की यात्रा कराते थे। बाद में बटकुट में मलिकों ने यह जिम्मेदारी संभाल ली, क्योंकि मार्ग को बनाए रखना और गाइड के रूप में कार्य करना उनकी जिम्मेदारी थी। वे ही बीमारों, वृद्धों की सहायता करते और उन्हें अमरनाथ के दर्शन कराते थे इसलिए मलिकों ने यात्रा कराने की जिम्मेदारी संभाल ली। इन्हें मौसम की जानकारी भी होती थी। आज भी चौथाई चढ़ावा इस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है।

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दरअसल, मध्यकाल में कश्मीर घाटी पर विदेशी ईरानी और तुर्क आक्रमणों के चलते वहां अशांति और भय का वातावरण फैल गया जिसके चलते वहां से हिन्दुओं ने पलायन कर दिया। पहलगांव को विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने सबसे पहले इसलिए निशाना बनाया, क्योंकि इस गांव की ऐतिहासिकता और इसकी प्रसिद्धि इसराइल तक थी। भारतीय मान्यता अनुसार यहीं पर सर्वप्रथम यहूदियों का एक कबीला आकर बस गया था।

इस हिल स्टेशन पर हिन्दू और बौद्धों के कई मठ थे, जहां लोग ध्यान करते थे। ऐसा एक शोध हुआ है कि इसी पहलगांव में ही मूसा और ईसा ने अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। बाद में उनको श्रीनगर के पास रौजाबल में दफना दिया गया।

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पहलगांव का अर्थ होता है गड़रिए का गांव। ऐसे में जब आक्रमण हुआ तो 14वीं शताब्दी के मध्य से लगभग 300 वर्ष की अवधि के लिए अमरनाथ यात्रा बाधित रही। कश्मीर के शासकों में से एक था 'जैनुलबुद्दीन' (1420-70 ईस्वी), उसने अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी। फिर 18वीं सदी में फिर से शुरू की गई। वर्ष 1991 से 95 के दौरान आतंकी हमलों की आशंका के चलते इसे इस यात्रा को स्थगित कर दिया गया था।

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यह भी जनश्रुति है कि मुगल काल में जब कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया जा रहा था तो पंडितों ने अमनाथ के यहां प्रार्थना की थी। उस दौरान वहां से आकाशवाणी हुई थी कि आप सभी लोग सिख गुरु से मदद मांगने के लिए जाएं। संभवत: वे हरगोविंद सिंहजी महाराज थे। उससे पहले अर्जुन देवजी थे। अर्जुन देवजी से लेकर गुरु गोविंद सिंहजी तक सभी गुरुओं ने मुगलिया आतंक से भारत की रक्षा की थी।

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पौराणिक मान्यता है कि एक बार कश्मीर की घाटी जलमग्न हो गई। उसने एक बड़ी झील का रूप ले लिया। जगत के प्राणियों की रक्षा के उद्देश्य से ऋषि कश्यप ने इस जल को अनेक नदियों और छोटे-छोटे जलस्रोतों के द्वारा बहा दिया। उसी समय भृगु ऋषि पवित्र हिमालय पर्वत की यात्रा के दौरान वहां से गुजरे। तब जल स्तर कम होने पर हिमालय की पर्वत श्रृखंलाओं में सबसे पहले भृगु ऋषि ने अमरनाथ की पवित्र गुफा और बर्फानी शिवलिंग को देखा। मान्यता है कि तब से ही यह स्थान शिव आराधना का प्रमुख देवस्थान बन गया और अनगिनत तीर्थयात्री शिव के अद्भुत स्वरूप के दर्शन के लिए इस दुर्गम यात्रा की सभी कष्ट और पीड़ाओं को सहन कर लेते हैं। यहां आकर वह शाश्वत और अनंत अध्यात्मिक सुख को पाते हैं।

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कितनी प्राचीन गुफा? :

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से करीब 141 किलोमीटर दूर 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को पुरातत्व विभाग वाले 5 हजार वर्ष पुराना मानते हैं अर्थात महाभारत काल में यह गुफा थी। लेकिन उनका यह आकलन गलत हो सकता है, क्योंकि सवाल यह उठता है कि जब 5 हजार वर्ष पूर्व गुफा थी तो उसके पूर्व क्या गुफा नहीं थी?....हिमालय के प्राचीन पहाड़ों को लाखों वर्ष पुराना माना जाता है। उनमें कोई गुफा बनाई गई होगी तो वह हिमयुग के दौरान ही बनाई गई होगी अर्थात आज से 12 से 13 हजार वर्ष पूर्व।

पुराण के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले श्री बाबा अमरनाथ के दर्शन हैं। और कैलाश को जो जाता है, वह मोक्ष पाता है। पुराण कब लिखे गए? कुछ महाभारतकाल में और कुछ बौद्धकाल में। तब पुराणों में इस तीर्थ का जिक्र है। इसके बाद ईसा पूर्व लिखी गई कल्हण की 'राजतरंगिनी तरंग द्वि‍तीय' में उल्लेख मिलता है कि कश्मीर के राजा सामदीमत (34 ईपू-17वीं ईस्वीं) शिव के भक्त थे और वे पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा करने जाते थे। बर्फ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं मिलता।

इस उल्लेख से पता चलता है कि यह तीर्थ कितना पुराना है। पहले के तीर्थ में साधु-संत और कुछ विशिष्ट लोगों के अलावा घरबार छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकले लोग ही जा पाते थे, क्योंकि यात्रा का कोई सुगम साधन नहीं था इसलिए कुछ ही लोग दुर्गम स्थानों की तीर्थयात्रा कर पाते थे।

बृंगेश संहिता, नीलमत पुराण, कल्हण की राजतरंगिनी आदि में अमरनाथ तीर्थ का बराबर उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में कुछ महत्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख है, जहां तीर्थयात्रियों को अमरनाथ गुफा की ओर जाते समय धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते थे। उनमें अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी (2,811 मीटर), सुशरामनगर (शेषनाग, 3454 मीटर), पंचतरंगिनी (पंचतरणी, 3,845 मीटर) और अमरावती शामिल हैं

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ॐ यात्रा महाकुंभ ॐ

 

  2019 में संगम नगरी इलाहाबाद में लगने वाले कुंभ मेले के शाही स्‍नान की तारीख का ऐलान हो चुका है। यह शाही स्नान 14 जनवरी से शुरू होगा।  

नई दिल्‍ली: हिंदू धर्म में कुंभ (Kumbh) मेला एक महत्‍वपूर्ण पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसमें देश-विदेश से सैकड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं। कुंभ का संस्कृत अर्थ कलश होता है। हिंदू धर्म में कुंभ का पर्व 12 वर्ष के अंतराल में आता है।

प्रयाग में दो कुंभ मेलों (Kumbh Mela) के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। कुंभ का मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है। इस दिन जो योग बनता है उसे कुंभ स्नान-योग कहते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार मान्‍यता है कि किसी भी कुंभ मेले में पवित्र नदी में स्‍नान या तीन डुबकी लगाने से सभी पुराने पाप धुल जाते हैं और मनुष्‍य को जन्म-पुनर्जन्म तथा मृत्यु-मोक्ष की प्राप्‍ति होती है। 


 

संगम नगरी इलाहाबाद में लगने वाले कुंभ मेले के शाही स्‍नान की तारीख का ऐलान हो चुका है। यदि आप भी अगले साल कुंभ मेले में स्‍नान करने की सोंच रहे हैं तो यहां जानें शाही स्नान की तारीख... 

2019 कुंंभ मेले की शाही स्नान की तारीख-

  • 14-15 जनवरी 2019: मकर संक्रांति (पहला शाही स्नान)
  • 21 जनवरी 2019: पौष पूर्णिमा
  • 31 जनवरी 2019: पौष एकादशी स्नान
  • 04 फरवरी 2019: मौनी अमावस्या (मुख्य शाही स्नान, दूसरा शाही स्नान)
  • 10 फरवरी 2019: बसंत पंचमी (तीसरा शाही स्नान)
  • 16 फरवरी 2019: माघी एकादशी 
  • 1 9 फरवरी 2019: माघी पूर्णिमा
  • 04 मार्च 2019: महा शिवरात्री 




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